ईश्वर का धन्यवाद है कि Federation of Indian Small Scale Battery Association के प्रयत्नों के कारण सरकार बैटरीजनों के लिए कुछ करती प्रतीत हो रही है। Ministry of New & Renewable Energy ने फैडरेशन के 18 दिसम्बर 2025 के पत्र पर सपोर्टिंग डाक्यूमेंट्स मांगे हैं ताकि इस मामले को आगे बढ़ाया जा सके। बैटरी डायरेक्टरी के 30 दिसम्बर 2025 को प्रकाशित अंक 22 में हिंदी में और अंक 23 में अंग्रेजी में प्रकाशित लेख में हमने विस्तार से बताया है कि लैड बैटरी की उपेक्षा देश को कितनी महंगी पड़ सकती है, लैड बैटरी और लिथियम बैटरी में कौन श्रेष्ठ है और क्यों।
बैटरी फैडरेशन के प्रयास
फैडरेशन नवंबर 2017 से ही सरकार से अनुरोध कर रही थी कि MSME में रजिस्टर्ड बैटरी यूनिट्स द्वारा निर्मित बैटरियों पर जीएसटी दरें कम हों, लिथियम आयन बैटरियों को लैड बैटरियों की अपेक्षा संरक्षण और प्रोत्साहन की नीति पर सरकार पुनर्विचार करे, ई-रिक्शा वाहनों में अगले वर्ष से केवल लिथियम बैटरियों को ही लगाने के शासनादेश पर पुनर्विचार हो।
अभी तक लैड बैटरियों पर 28% जीएसटी लगता था जबकि लिथियम-आयन बैटरियों पर वर्ष 2018 से ही 18% जीएसटी लग रहा था। जीएसटी काउंसिल की 56वीं बैठक में दोनों प्रकार की बैटरियों पर 23 दिसंबर 2025 से जीएसटी की दरें एक समान अर्थात 18% कर दी गई हैं।
ई-रिक्शा में केवल लिथियम-आयन बैटरी लगाने के शासनादेश के विरुद्ध फैडरेशन ने केंद्र सरकार के 6 मंत्रालयों में विरोध दर्ज कराया है। EPR पोर्टल पर जो 28 दिसंबर 2025 से शुरू हुआ है, के विषय में भी फैडरेशन ने अपने सुझाव भेजे हैं।
केवल लैड बैटरी नहीं बहुत से सहयोगी उद्योगों पर दुष्प्रभाव
पिछले लगभग सौ वर्षों से देश में छोटी-बड़ी हजारों औद्योगिक ईकाइयाँ, बैटरी बनाकर ऑटोमोटिव, इंडस्ट्रियल, इंवर्टर और सोलर क्षेत्र की सेवा करती आ रही हैं। बैटरी निर्माण एक फैक्ट्री में एक छत के नीचे संभव नहीं होता। अनेक एंसिलियरी यूनिट्स बैटरी निर्माण में सहभागी बनती हैं, अपना-अपना योगदान देती हैं तब एक बैटरी बन पाती है। ये एंसीलियरी यूनिट्स एक-दो नहीं बहुत सी हैं। इनमें प्रमुख हैंः-
1. लैड स्मेल्टिंग, लैड-एलॉयज, लैड सब-ऑक्साइड, रेड लैड उत्पादक ईकाइयाँ;
2. हीट सील्ड बैटरी कंटेनर, ईकाइयाँ;
3. वुडन सैपरेटर, पीवीसी सैपरेटर, एजीएम सैपरेटर, एनवलेप सैपरेटर ईकाइयाँ;
4. बैटरी केमिकल्स जैसे लिगनिन, बेरियम सल्फेट, कार्बन ब्लैक, एडिटीव्ज आदि की ईकाइयाँ;
5. पैकिंग जाली, पोल कैप, बॉटम ब्रिज ईकाइयाँ;
6. सैरेमिक वेंट प्लग्स, बैटरी टर्मिनल फास्नर्स, ह्यूम एरेस्टर ईकाइयाँ;
7. टिन कोटेड नट बोल्ट, बैटरी टर्मिनल ईकाइयाँ;
8. बैटरी प्लेट निर्माण ईकाइयाँ;
9. हाइड्रोमीटर निर्माण ईकाइयाँ;
10. बैटरी चार्जिंग और बैटरी टेस्टिंग निर्माण ईकाइयाँ;
11. बैटरी स्टिकर ईकाइयाँ;
12. बैटरी ग्रेड एसिड ईकाइयाँ;
13. इनवर्टर निर्माण ईकाइयाँ;
14. एसिड कूलिंग सिस्टम निर्माण ईकाइयाँ;
15. बैटरी मशीनरी जैसे लैड रिफाइनिंग प्लांट, लैड रिफाइनिंग फर्नेस, बॉल मिल, इनगोट कास्टिंग मशीन, रेड लैड फर्नेस आदि मशीन निर्माण ईकाइयाँ;
16. बैटरी टेस्टिंग टूल्स निर्माण ईकाइयाँ;
17. थर्मोकोल पैकिंग ईकाइयाँ और भी बहुत सी एंसिलियरी यूनिट्स।
खेद की बात यह है कि किसी भी पार्टी की सरकार ने कभी नहीं सोचा कि इनके उत्पादनों को और अधिक बेहतर और आधुनिक बनाने के लिए योजनाएं बनाई जाएं, शोध कराया जाए ताकि उनके उत्पाद वर्ल्ड क्लास बन सकें और न केवल देश में बल्कि विदेशों में इन उत्पादों का निर्यात हो सके, MSME के उत्पाद बड़ी बैटरी कंपनियों की बैटरियों को क्वालिटी और कीमत में टक्कर दे सकें।
उन दिनों को याद करें जब देश में खाद्यान्न की कमी थी, विदेशों से लाल गेहूं का आयात होता था। क्या उस समय सरकार ने फसलों का उत्पादन बढाने, उनकी क्वॉलिटी बेहतर करने के लिए देश में पूसा इंस्टीट्यूट जैसे कृषि अनुसंधान केंद्र स्थापित नहीं किये ? उत्तर प्रदेश में गन्ना उत्पादकों को सहायता देने के लिए गन्ना अनुसंधान केंद्र स्थापित नहीं किए ? जब माननीय नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने, उन्होंने गुजरात में कार्यरत मुस्लिम पतंग निर्माताओं की शोचनीय आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए क्या कुछ नहीं किया ?
देश के MSME बैटरी निर्माता वर्षों से विदेशों से बैटरियाँ, मशीनें और उपकरण का आयात कर रहे हैं। ये सब सरकार की जानकारी में है लेकिन कभी किसी पार्टी की सरकार ने इस क्षेत्र में इनोवेशन की जरूरत को नहीं समझा। अनुसंधान केंद्र खोलकर उन्नत टेक्नोलॉजी, उन्नत मशीनें और उपकरण देश में ही बनाने की नहीं सोची। यदि किसी सरकार ने अनुसंधान की जरूरत समझ कर इस ओर ध्यान दिया होता और देश के उद्यमियों को तकनीकी परामर्श और बिना गारंटी आसान शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराया होता, जरूरी मशीनों को देश में ही निर्माण करने का प्रबंध किया होता तो आज लैड बैटरी उद्योग के बंद होने की नौबत नहीं आती।